डोकलाम विवाद: आज भी नहीं बदली चीन की नीयत, भारत भी है पूरी तरह तैयार

डोकलाम विवाद: आज भी नहीं बदली चीन की नीयत, भारत भी है पूरी तरह तैयार

by Preeti Chaudhary

डोकलाम में सीमा विवाद के चलते भारत और चीन की सेनाऐं एक दूसरे के समक्ष हैं। जिसमें कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं। चीन की मंशा पड़ोसी देशों के साथ कभी भी मित्रवत नहीं रही है और वह सीमा क्षेत्रों को लेकर विवाद पैदा करता रहा है। चीन डोकलाम क्षेत्र में सड़क निर्माण करना चाहता है जिससे भूटान के साथ तिब्बत जैसा कृत्य दोहराया जा सके तथा भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक अपनी पहुंच बना सकें। चीन के इन मन्शूबों से भारत अच्छी तरह वाकिफ है इसीलिए भूटान को मित्र देश के रूप में सुरक्षा प्रदान करने की भारत की नीति से चीन बौखलाया हुआ है।

तिब्बत पर भी किया जबरन कब्ज़ा

पड़ोसी देशों पर दबाव बनाने की नीति चीन की पुरानी नीति है। 1969 में चीन ने तिब्बत पर जबरन हमला बोल दिया था, तब बड़ी संख्या में तिब्बतियों ने भारत में आकर शरण ली थी। 31 मार्च 1959 को तिब्बतियों के सबसे बड़े गुरु दलाई लामा को भी तिब्बत छोड़कर भारत आना पड़ा था। सीमा पर बसे तिब्बतियों ने कभी तिब्बत नहीं देखा, वह भारत में ही पैदा हुए। भारत में जन्मे तिब्बतियों के मन में भी चीन के प्रति कोई अपनापन नहीं है। 1959 में चीन ने तिब्बतियों के साथ जो किया वही अब वह भूटान के साथ दोहराने की कोशिश में है। लेकिन भारत ने जिस चीन को पडोसी जानकार 1959 में गलती की थी वही गलती भारत दोबारा दोहराना नहीं चाहेगा।

क्या है डोकलाम विवाद

भौगोलिक रूप से डोकलाम भारत, चीन और भूटान के बॉर्डर के तिराहे पर स्थित है। भारत के नाथुला दर्रे से डोकलाम की दूरी मात्र 15 किलोमीटर है और डोकलाम क्षेत्र भारत और चीन दोनों के लिए सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र को लेकर चीन और भूटान के बीच 1988 और 1998 में समझौते हो चुके हैं कि दोनों देश डोकलाम क्षेत्र में शांति बनाए रखने की दिशा में कार्यरत रहेंगे। इसके साथ ही 1949 में भारत और भूटान के बीच संधि हुई थी कि भारत भूटान की विदेश नीति और रक्षा मामलों का मार्गदर्शन करेगा, लेकिन 2007 में भूटान को भारत से दिशा निर्देश मिलने की जरूरत को खत्म कर दिया गया था।

चीन भूटान के साथ की गई संधि को तोड़ रहा है और भारत के सिक्किम, चीन और भूटान के तिराहे पर स्थित डोकलाम पर हाईवे बनाने की कोशिश कर रहा है। हाईवे बनाने के पीछे चीन की मंशा भूटान के इस क्षेत्र तक सुगमता से आवाजाही करना है परंतु चीन का इस क्षेत्र में सड़क बनाना भारत के लिए नुकसानदेय हो सकता है क्योंकि डोकलाम क्षेत्र पर चीन के कब्जे से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों तक चीन की पहुंच आसान हो जाएगी, फिर चीन पूर्वोत्तर राज्यों को भारत से अलग करने की नीति पर काम करना चाहेगा। इसी कारण भारत चीन की  डोकलाम क्षेत्र में आगे बढ़ने की किसी भी मंशा को ख़त्म कर देना चाहता है। चीन ने यही नीति तिब्बत के साथ भी अपनायी थी और तिब्बत के पहाड़ी इलाकों में हाईवे का निर्माण कर भारत में युद्ध की स्थिति पैदा होने पर सैन्य साजो-सामान को भारत की सीमा तक पहुंचाने का बंदोबस्त कर लिया।

नहीं बदली चीन की मंशा

पिछले 55 सालों में चाहे कुछ बदला हो परंतु चीन की न तो नीयत बदली है और ना ही नीति। सिक्किम में रहने वाले तिब्बती लोगों को भारत पर पूरा भरोसा है. और वे हर कदम पर भारत के साथ हैं। भारत की सेना न केवल डोकलाम क्षेत्र में पूर्ण स्वतंत्रता से खड़ी है बल्कि डोकलाम के निचले क्षेत्र सिक्किम में भी मुस्तैदी के साथ तैनात है। चीन हमेशा से एक ही बेसुरा राग अलापता रहा है कि 1890 में अंग्रेजों के साथ हुए समझौते के तहत डोकलाम क्षेत्र उसका है जबकि प्रधानमंत्री नेहरू ने इस दावे को झूठा ठहराया था। साथ ही चीनी प्रधानमंत्री को खत लिखकर 1990 में कहा था कि चीन और अंग्रेजो के बीच हुए करार में सिक्किम पर भारत की संप्रभुता है।

डोकलाम विवाद पर अमेरिका का नजरिया

भारत और चीन के बीच उत्पन्न हुए डोकलाम विवाद पर अमेरिका अपनी दृष्टि बनाए हुए है और अमेरिका का कहना है कि इस विवाद पर दोनों देश प्रत्यक्ष रुप से एक दूसरे से बात करें तथा इसका हल निकालें। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता गैरी रॉस ने कहा था कि हम भारत और चीन के तनाव घटाने की खातिर प्रत्यक्ष वार्ता करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, जिसमें किसी प्रकार की जोर जबरदस्ती ना हो। भारत व चीन से बात करने के लिए तैयार है लेकिन वह चाहता है कि पहले दोनों तरफ की सेना को हटाया जाए जिससे सिक्किम क्षेत्र में तनाव थोड़ा कम हो सके।

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